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बुजुर्गों को डिप्रेशन से बचाने के लिए उनका ख्याल जरूर करे






बड़ी उम्र में लोगों को केवल कमज़ोर शरीर की ही समस्या नहीं होती। डिप्रेशन भी एक ऐसी समस्या है जिसका सामना बुज़ुर्गों को करना पड़ता है। डिप्रेशन एक ऐसी स्थिति है जो शरीरिक समस्याओं के साथ मिलकर गम्भीर बन जाती है और सेहतमंद रहने की प्रक्रिया को प्रभावित करता है। यही नहीं, आज की भाग-दौड़भरी दुनिया में, घर और काम की ज़िम्मेदारियों के बीच, परिवार के छोटे सदस्य अक्सर बुजुर्ग सदस्यों या पुरानी बीमारियों वाले मरीज़ों की छोटी-छोटी ज़रूरतों को पूरा करना भूल जाते हैं। जिसकी वजह से अक्सर किसी पर आश्रित लोगों में उपेक्षा, खुद की कम कीमत और मानसिक समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं।

एक साधारण वयस्क व्यक्ति की तुलना में, एक बुज़ुर्ग व्यक्ति को भावनात्मक सपोर्ट की अधिक ज़रूरत पड़ती है। बुजुर्गों के लिए भावनात्मक समर्थन का अर्थ है उनके मन में आनेवाले नकारात्मक विचारों- अकेलापन, असहायता, ऊब और घबराहट आदि से निपटने के लिए विशेष कदम उठाना है। पोर्टिआ मेडिकल के मेडिकल डायरेक्टर, डॉ. एम उदय कुमार मैया बता रहे हैं बुजुर्गों को डिप्रेशन का सामना करने में मददगार 10 आवश्यक और भावनात्मक बातें।

•  सुरक्षा- साधारण लोगों की तुलना में अधिक कमज़ोर होने के कारण, ज्यादातर वरिष्ठ अपनी सुरक्षा के संबंध में निरंतर चिंतित रहते हैं। यह ज़रूरी है कि उन्हें भावनात्मक और शीरीरिक रुप से सुरक्षा का आश्वासन दिलाया जाए।। इसके लिए आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि घर और बुज़ुर्गों के आसपास का वातावरण हर समय सुरक्षित रहेगा। आपको इन पोषक तत्वों की कमी डिप्रेशन का कारण बनती है।

•  ध्यान- बच्चों की तरह बुज़ुर्गों को भी देखरेख और हमारे ध्यान की ज़रूरत होती है। क्योंकि वे दुनिया की रफ्तार के साथ चल नहीं पाते। इसीलिए अपने बुज़ुर्गों की देखरेख का पूरा ख्याल रखें। उनकी खुशी इस बात पर निर्भर करती है कि वे आपके लिए अहम हैं और इसीलिए आप उनका ख्याल रख रहे हैं।

•  स्वायत्तता और नियंत्रण- भले ही आप उनका काफी ख्याल रखते हैं और उनकी सहायता करते हैं। लेकिन फिर भी अधिकांश बुजुर्गों को अब भी उनके जीवन पर कुछ स्वायत्तता या नियंत्रण चाहिए। जो काम वे खुद कर सकते हैं, उन कार्यों के लिए स्वतंत्रता देना महत्वपूर्ण है इसलिए, उन्हें रोज़मर्रा के छोटे-मोटे काम करने दें। इस तरह उन्हें घर का बड़ा-ज़िम्मेदार व्यक्ति होने और कुछ चीज़ों पर अपना नियंत्रण होने की खुशी देगा।

•  भावनात्मक जुड़ाव- खुद की कीमत कम मानकर खई बुज़ुर्ग खुद को अपने आसपास के सभी लोगों से अलग कर लेते हैं। इसीलिए बुज़ुर्गों की देखभाल करनेवाले लोगों को बुज़ुर्गों और अपने बीच भावनात्मक जुड़ाव फिर से स्थापित करने के लिए पहल करनी चाहिए और ताकि बुजुर्ग महसूस कर सकें कि आपको उनकी ज़रूरत है।

•  अपराधबोध खत्म करना- अपने बच्चों के साथ रहनेवाले बुज़ुर्गों को, खासकर आर्थिक रुप से मां-बाप पर आश्रित लोगों के मन मे यह अपराधबोध होता है कि वे अपने बच्चों की ज़िंदगी में दखलअंदाज़ी और अड़चन डाल रहे हैं। इसी तरह अपने बड़ों की देखभाल कर रहे लोगों को लगता है कि वे अपने मां-बाप को उस तरह की सुविधा नहीं दे पा रहे हैं, जैसी कि उन्हें ज़रूरत है। अगर किसी में इस तरह की भावना या अपराधबोध है तो अपने बड़ों को समझाएं कि उन्हें ऐसा महसूस करने की आवश्यकता नहीं है, और आपने उनको अपने साथ रखा है क्योंकि आपको उनकी ज़रूरत है।

•  संबंधित महसूस करना- ऐसे लोग जो बड़ी उम्र में भी अपने समाज में सक्रिय और घुलेमिले हुए होते हैं वे खुद का ज़्यादा खुशहाल और संतुष्ट महसूस करते हैं। दरअसल, समाज और समूहों में रहने से न केवल उन्हें उनसे संबद्ध होने की भावना महसूस होती है बल्कि साथ ही उन्हें अपने जैसी सोच रखनेवालों से मिलने और अपने विचार साझा करने का मौका मिलता है। इसीलिए पता करें कि आपके आसपास बुज़ुर्गों का ऐसा कोई ग्रुप सक्रिय है क्या, अगर हां, तो अपने माता-पिता को भी वहां ले जाएं।

•  दोस्ती और आत्मीयता- किशोर और नौजवानों की ही तरह, बुज़ुर्गों को भी एक भरी-पूरी ज़िंदगी के लिए प्यार और दोस्ती की ज़रूरत होती है। इसीलिए हमेशा अपने बुजुर्गों को – उन जगहों पर ले जाकर नए दोस्त बनाने का मौका दें जहां उनके आयु वर्ग के अन्य लोग मिलते-जुलते हैं।

•  प्रायवेसी- हमारी और आपकी तरह ही, हमारे बुज़ुर्गों ने भी एक वयस्क व्यक्ति की ज़िंदगी जी है और वे अपनी ज़िंदगी में थोड़ी निजिता या प्रायवेसी ज़रूर चाहेंगे। उनकी इस ज़रुरत का ध्यान रखते हुए ऐसा माहौल बनाएं जहां, उन्होंने अपनी ज़रूरत के अनुसार प्रायवेसी मिलती हो। ऐसा इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि कुछ मामलों में वे आपसे किसी विषय पर बात करने से पहले आपस में विचार-विमर्श और एकांत समय चाहते हैं।

•  सामर्थ्य- उम्र के साथ, खुद के सक्षम होने की भावना (जो कम उम्र में उन्होंने महसूस की है) महसूस करना बुज़ुर्गों के लिए मुश्किल हो जाती है। लेकिन, उन्हें यह महसूस कराना आवश्यक है कि वे इस उम्र में भी समर्थ और सक्षम हैं। इस तरह उन्हें खुश रहने में मदद मिलेगी। इसके लिए उन्हें याद दिलाते रहें कि समान आयु वर्ग के अन्य लोगों की तुलना में उन्होंने जीवन में क्या हासिल किया है।

•  ज़िंदगी का मकसद- अक्सर, बुज़ुर्गों को यह महसूस होने लगता है कि उनकी ज़िंदगी का कोई मकसद या अर्थ नहीं है। हालांकि, यह सच नहीं है। बजाय इसकी, बुज़ुर्गों की देखभाल करनेवालों को ध्यान देना होगा कि उनके बड़े अकेलापन या डिप्रेशन जैसी कोई भावना तो महसूस नहीं कर रहे। ऐसे में अपने बड़ों को यह समझाएं कि हर किसी की ज़िंदगी का मकसद होता है। हमेशा एक उद्देश्य होता है और इस उम्र में वह क्षितिज पर नए और सकारात्मक अनुभव कर सकते हैं।

○  डिप्रेशन का सामना

भारत में स्वास्थ्य खा ख्याल रखने का एक नया तरीका और जिसका लक्ष्य बुज़ुर्ग व्यक्तियों और रोगियों के जीवन को बेहतर बनाना है। वैसे जब हम घर के माहौल में किसी मरीज़ का ख्याल रखते हैं और इलाज करवाते हैं, तो इस बात की ओर ध्यान देना होगा कि किसी पुरानी समस्या की वजह से होनेवाला डिप्रेशन या बढती उम्र का भी ध्यान रखा जाए।

अक्सर ज्यादातर बुज़ुर्गों में विभिन्न प्रकार के विचारों के कारण डिप्रेशन अनियंत्रित हो जाता है, जो कि स्थिति को और भी बदतर बना देते हैं। डिप्रेशन से जूझ रहे बहुत कम लोगों के सही इलाज मिल पाता है और इसकी वजह खुद को अच्छी तरह से न समझना, अकेलेपन या छोड़े जाने के डर, सपोर्ट की कमी या किसी और कारण की वजह से बात करने की अनिच्छा है। जहां ज़्यादातर शारीरिक समस्याओं की जांच और इलाज आसानी से किया जाता है, वहीं ज़्यादातर मामलों में मानसिक तकलीप को कम करने और अच्छे जीवन के लिए निरंतर देखभाल और ध्यान देने की ज़रूरत पड़ती है। डिप्रेशन को नियंत्रित करने की ओर पहला कदम यही है कि जल्द से जल्द उसकी पहचान की जा सके।